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मायवी धुन (कविता)

Written By YMC on Sunday, May 2, 2010 | 4:00 AM


हिजोका अनुपस्थित
-------आस्था
-------र खुशीहरु,
आँचलमा शुद्धताको
........रेखीबुट्टा हालेर
----------नयाँ सम्बतमा
-------------प्रेम प्रस्ताबको
--------------रंगिन-पत्र बोकी
----------------अब आँउनै पर्छ l

जीवन-चर्खामा संधैं
कातिएको काँचो धागो,
--------खेस र गिम्तीको
------तानमा सीमित नहुन्,
अब,
-------बेलाको रेशमी खेतीले
--------मलमल जीवनको शुद्ध
---------युगिन वस्त्र फेरिनु पर्छ l

--यातनाको सन्सारमा
-----जानेर पनि नजानी
--------दिशा भ्रमित......
------------पथहरुमा हिंड्ने
-----धर्मवीर युधीष्ठिरहरु हो !
-----------------ब्रम्हानेत्र खोलेर
 अब,
-------------कोलम्बस भएर हिड्नू,
-------------------सुन्दर संसार भेटेर
-----------------------कर्मवीर योद्ध हुनू !

--------अकालको------
--------शिकारबाट------
छुटेर शान्तिका परेवाहरु
-----सभ्यताको गुँडमा.....
-----मायावी धुन घुर्दै----
चिरकालसम्म रमाउन् l

----अब उपरान्त---
कविताको विम्बमा
रुकुम, रोल्पा नपरोस,
मेरो अध्याँरो भूगोलमा
---बिमुखको रापिलो---
---अग्निकुण्ड निभेर---
---नविन उन्मुखको---
--------अपार--------
पृथ्वी--सम्म--खारियोस l

बेईमान
----र----
वैभावको
-अग्लो-
पहाडबाट
---झरेर---
--धुमिलो--
आकाशको
जून पखाल्न
----अब----
---इमान---
-----र---
--समान--
धरातलको
सहयात्रामा
आजै निस्कौं l

* खेस, गिम्ती = परम्परागत कपडा बुनाईको (लुम) तानको प्रकार साधा बुनाईलाई खाँडी भनिन्छ भने त्यसमा थोरै लुमहरु मिलाएर उही धागोको मसिनो बुट्टा निकालिएकोलाई खेस र गिम्ती भनिन्छ l

* सम्म--खारियोस= मैदान होस् l

मनु लोहोरुङ्
०१/०१/२०६७
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